Sunday, September 11, 2011

पाँच बिन्दु

वे पाँच बिन्दुएँ ...

उन पांच बिन्दुओं को
देखना तुम्हारा ...
आँगन की मिटटी पर बनीं
वो बिन्दुएँ...
केवल पांच निशान ही तो थीं,
लेकिन तुम्हारा
उन्हें उस तरह देखना...

कितना और कैसे बदल गया था
उनका मतलब

जैसे सारा आकाश
धरती की सारी हरियाली,
नदी के पानी से उठती भाप,
सिंघारा के पेड़ के नीचे
फूलों का वो पथार,
नए बाछा का रोआं,
उसकी ऑंखें,
उसकी छोटी पूँछ,
ताजा खीरे के कांटे

और भी पता नही क्या-क्या,
कितना कुछ था
उन बिन्दुओं में

मैंने तो सिर्फ पाँच बिन्दुएँ बनाई थीं
तुमने तो उसमें पूरी दुनिया ही भर दी

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